श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ – आनंदवाणी

प्रतिपल जागरुक हों

आषाढ मुनि अब पूरी तरह से जाग गए और गुरुजी के पास आ गए । संयम में पूर्ण रूप से स्थिर हो गए । गृहस्थी में जाने की सोच अब बिलकुल नहीं । नाटककार का परिवार भी अब दिमाग से पूरी तरह निकल गया है । पॉझिटिवली और नेगेटिवली दोनों तरह से वह अब दिमाग में नहीं है । बस, अब अपने संयम में लगे हुए हैं । पूरी अवेयरनेस के साथ वह अपने संयम में लगे हुए हैं । कहीं कोई गलती न हो, इसके लिए प्रयत्नशील हैं । अब वैक्रिय लब्धि के प्रयोग की भी भावना नहीं हैं । जिन्दगी में पुनः युटर्न आया और वे मोक्षमार्ग पर अग्रसर हो गए । पूरी तरह संयम में लीन – कहीं मेरे हाथ गलत न चलें, कदम गलत न उठें, मन में भी कभी कोई गलत भाव न आएँ – इस तरह से वे सजग हो गए । यह अवेयरनेस मोक्षमार्ग ती ओर ले जाने के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण है ।

हमें वर्तमान में जीना आना चाहिए । भूत या भविष्य के विचार में हम वर्तमान से दूर हो जाते हैं । इसीलिए जीते तो हैं पर जागरुक होकर जीने के पल बहुत कम होते हैं । छोटी-छोटी बातों में हम जागते हुएँ भी सोये रहते हैं । आँखे होते हुए भी गलत ढंग से चलते हैं, गलत बोलते हैं, गलत सुनते हैं, गलत करते हैं । अगर कोई कह दे कि आप गलत करते हैं तो मानना मुश्किल लगता है, बुरा लगता है अथवा हम अपनी गलती किसी ओर पे ढकेल देते हैं ।

राजा श्रेणिक 100 भाई थे । उनके पिताजी राजा प्रसेनजित ने एक दिन अपना उत्तराधिकारी घोषित करने के लिए अपने बेटों की परीक्षा ली । सभी बेटों को भोज पर बुलाया । बड़े हॉल में सभी के लिए व्यवस्था करवा दी । समय पर सभी बेटे आए, प्रार्थना की और जैसे ही खाना खाने के लिए हाथ आगे बढ़ाया की हॉल के दूसरे दरवाजे से शिकारी कुत्ते छोड़े गए । अचानक शिकारी कुत्तों का आना देखकर सभी घबरा गए । और भाग गए । केवल एक राजकुमार बैठा रहा – श्रेणिक । वह आराम से अपना खाना खाता रहा और जैसे-जैसे कुत्ते उसके पास आए, वैसे-वैसे उसने आजू-बाजू की प्लेट्स उनके सामने सरका दीं । कुत्तों का भी पेट भर गया और श्रेणिक का भी । अगले दिन राजा के दरबार में सभी उपस्थित हुए । राजा ने पूछा – कल सबने भोजन किया था? सभी बेटे बोले – ‘‘पिताजी! खाने के नाम का अच्छा मजाक किया आपने ।’’ ‘‘हमने किसी ने भी खाना नहीं खाना ।’’ पिताजी ने पुनः पूछा । तब श्रेणिका बोला- ‘मैने खाया ।’ उसने सारी बात बता दी की कैसे उसने खाया । पिताजी बोले- ‘‘यही मेरा उत्तराधिकारी बनेगा । क्योंकि जो कुत्तों को बॉंटकर खाता है, वो ही जागरुक है और वो ही निर्विघ्न राज्य कर सकता है ।’’

अर्थात् विरोधियों के प्रति भी जागरुकता रखता है, उनके साथ भी शेअर करता है, वो ही उनको अपना बना सकता है और वो ही साधक अरिहंत पद प्राप्ति के योग्य बन सकता है । अथवा अचानक कष्ट आने पर भी हम घबराएँ नहीं, जागरुक रहें और उसका सामना करने के लिए डटकर तैयार रहें तो ही अरिहंत पद प्राप्ति के योग्य हम बन सकते हैं ।

वे ऑफ लाईफ प्रणेता

ध्यानसिद्धा श्रमणी अक्षयश्री ‘आखा’जी म.सा.

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