श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ – आनंदवाणी

जीवन की सांपसीढ़ी – एक दिलचस्प धारावाह

(गतांक से आगे…)

भीमसेन ने केशव माली के अश्रुपूर्ण नयन पोंछे और उसको सांत्वना देते हुए कहा कि भाई! अपने भाग्य में यदि है, तो मिलेगा ही । अपने भाग्यपर भरोसा रखो। इसीप्रकार पॉझिटिव वचन से उसका बल बढ़ाया । माली अपनी कुटिया में चला गया । भीमसेन भी अपने परिवार सहित कुटिया में चला गया ।

खाट पर लेटे-लेटे भीमसेन विचार करता है – ‘‘इस संसार का स्वरूप जितना सुन्दर दिखता है उतना ही भयानक है । सत्तासुख व विषयसुख के स्वप्न में तन्मय होकर मैं इस अनमोल मनुष्य जीवनका कोई सदुपयोग नहीं कर सका । और, अब तो जीवन यापन की ही चिंता उपस्थित हो गई है। खैर, जो भी है, वह अब मेरे किए हुए कर्मों का ही फल है । बस, इतनी सद्बुद्धि मेरी बनी रहे कि चाहें सुख आए या दुख आए – मैं देव, गुरु, धर्म को कभी नहीं भुलूँ । अच्छे समय में संसार के आनंद में मैं डूब ना जाऊँ । ‘‘धन मळे के ना मळे, पण धर्म ने हूँ जाणवुँ । तारो नाम भुलाय नहीं, बस एटलुं संभाळवुँ । वे छतां भूलो पडूँ तो, सांचे रस्ते वारजे । कंई खोटुं कामकरतो होऊँ, त्यारे तूमने वारजे ॥ हे प्रभो ! आप सभी जीवों के मार्गदर्शक हैं । मेरे भी मार्गदर्शक बनकर मुझे सही रास्ते पर चलाते रहना ।’’

ये भावना भाते-भाते भीमसेन को नींद लग गई । रात्रि भी पूरी होने को आई । सूर्य ने अपनी किरणों से संसार को जागृत करने हेतु उदयाचल की ओर प्रस्थान किया । रात को ही माली ने बैलगाड़ी तैयार कर ली थी । निकलते समय मालिन ने एक पोटली भीमसेन को पकड़ाई और कहा-‘‘यह रख लो । अल्पाहार है – काम आएगा।’’ भीमसेन ने माली-मालिन का आभार माना ।

सूर्योदय के कुछही समय पश्चात् वे सभी नगर में प्रविष्ट हुए और बावड़ी पर माली ने सबको उतार दिया । उनसे विदा लेकर माली नगर में आगे चला गया । भीमसेन का परिवार माली द्वारा बताए गए सुन्दर-मनोहर स्थान में बावड़ी के पास रुके । मालिन की दी हुई पोटली में से ही नवकारसी करी । तत्पश्चात् भीमसेन कुछ काम एवं स्थान की तलाश में नगर में जाता है । सुशीला, देवसेन, केतुसेन वहीं रुकते हैं । वह स्थान सुरक्षित स्थान था । बावड़ी के कारण लोगों का, विशेषतया महिलाओं का आवागमन निरंतर होता रहता था । पानी भरने के लिए आई हुई महिलाओंकी नज़र सुशीलापर पड़ती तो वे आश्चर्यचकित हो जाती उसके रूप को देखकर । कपड़े आदि देखकर तो लगता है कि किसी गरीब की पत्नी होगी । परंतु है तो बड़ी सुन्दर । बच्चे भी बड़े अच्छे लगते हैं मानो किसी राजा के बेटे हों । कोई अजनबी ही जान पड़ते हैं।

सामान्य मानसिकता यही है कि गरीबी और सुन्दरता का विरोध होता है । जो गरीबहै, वो सुन्दर/तेजवान नहीं होता – ऐसा माना जाता है । जो अमीर होता है, वो सुन्दर होता है – ऐसी गलत धारणा जनमानस में देखने को मिलती है । इसीलिए, कोई गरीब सुन्दर, तेजस्वी दिखे तो आश्चर्य होता है ।

भीमसेन नगर में आया । प्रत्येक व्यापारी की दुकानदारी अच्छी चल रही थी । सुबह से ही लोगों की भीड़ बाज़ार में नज़र आ रही थी । दूसरे गॉंव के भी ग्राहक बाज़ार में आए हुए दिख रहे थे । ऐसे भीड़-भाड़ में किससे पूछे कि कोई काम है क्या? चलता जा रहा है, निरखता जा रहा है । और अब वह पहुँचा उस नगर के गंधि बाजार में ।

 वे ऑफ लाईफ प्रणेता, ध्यानसिद्धा

श्रमणी अक्षयश्री ‘आखा’ जी म.सा.

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