श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ – आनंदवाणी

जीवन की सांपसीढ़ी – एक दिलचस्प धारावाह (वराह की चीत्कार)

(गतांक से आगे…)

वर चीत्कार थी वराह (जंगली सूअर) की । अश्वों को अभी बॉंधा नहीं था । वराह को इस ओर आता देखकर दोनों अश्व भागने लगे । वराह भी उनके पीछे-पीछे भाग निकला । जंगली वराह डरपोक नहीं होते और हमला कर अपने शिकार को नोंच डालते हैं । नदी किनारे पहुँचकर मटके को साफ कर रहे भीमसेन ने भी वराह की चीख सुनी । उसने उसके पास कमर में लटक रही तलवार निकाली । एक हाथ में तलवार थी, दूसरे से मटका कंधे पर रखकर कुटिया की तरफ आया । तब तक सुशीला व बच्चे कुछ शांत हुए बैठ गए थे । भीमसेन ने घास का दरवाजा खोला, अन्दर आया, मटका रखा और पूछा – ‘‘अश्व कहॉं हैं?’’

सुशीला को आश्चर्य हुआ की अश्व तो बाहर ही थे । भीमसेन को लगा कि वराह की चीख से डरकर इधर-उधर हो गए होंगे। अतः, वह बाहर कुछ दूर तक चारों बाजू अश्वों को देखकर आता है । परन्तु अश्व होते तो मिलते । वे तो ना जाने कहॉं भाग गए थे? हताश मन से भीमसेन कुटिया में लौटा । सुशीला के पूछने पर बोला – ‘‘कर्मराजा का एक और तमाचा।’’ ‘‘लगता है दोनों अश्व अपनी जान बचाने के लिए भाग गये हैं ।’’

सामान-भोजन-वस्त्र-मुद्राओं की थैली कहते-कहते सुशीला बेहोश हो गई । कुछ सहारे की वस्तुओं के जानेपर सुशीला दुःखित हो जाती है । भीमसेन नेपानी छिड़ककर, सुशीला को हिलाकर जाग्रत किया, होश में लाया और बताया कि पूर्व के अनुभव से मैंने मेरे उत्तरीय वस्त्र में आठ रजत मुद्राएँ बांधकर रखी हैं । नगर में पहुँचकर इतनी मुद्राएँ सेहम फिर ज़िन्दगीकी शुरुआत करेंगें । तुम चिंता मत करो । अभी सूर्यास्त होने में थोड़ी देर है । मैं जंगल में जाकर पेड़पर से कुछ फल ले आता हूँ । तुम द्वार अटका कर बैठो ।

सुशीला पुनः विचारों में झूलने लगी । ‘‘ऐसे कौन से पाप किए होंगें कि दुख के ऊपर दुख ही आते जा रहे हैं । इससे तो बच्चों को कौशांबी भेज दिया होता तो अच्छा रहता ।’’ तभी देवसेन बोला- ‘‘मॉं! पिताजी कहॉं गए हैं?’’ ‘‘पिताजी तुम्ही लिए ताजे फल लाने गए हैं ।’’ केतुसेन बोला- ‘‘मॉं! हमारा घर कब आएगा?’’ ‘‘बेटा! वैसे तो जल्दी आ जाता, परन्तु हमारे अश्व भाग गए हैं इसीलिए थोड़ा धीरज रखना पड़ेगा ।

घर था तो भी छोड़ना पड़ा । अरे रे! युवराज को ऐसे सत्ता का लोभ क्यों हुआ…? और हुआ भी तो बड़े भाई से बात करता – महाराज हँसते-हँसते राजपाट सौंप देते । राम-लक्ष्मण की जोड़ी को न जाने किसकी नज़र लग गई । युवराज काभी क्या दोष? हमारे ही पाप का उदय होना था । उसमें वो निमित्तबने । ऐसे अनेक विचार करते-करते लगभग आधी घड़ी (10 मिनिट) जितना समय बीत गया । भीमसेन अभी तक आया नहीं । विचार- विचार में कुटिया का द्वार लगाना भी रह गया था ।

केतुसेन को प्यास लगी । उसने मॉं से लोटा मॉंगा पानी पीने के लिए । लेकिन दुर्भाग्य अश्व सारा सामान लेकर भागचुके थे । सुशीला ने देखा- बाहर पलाश का पेड़ है । वह उठी, बाहर आकर 10-12 पत्ते तोड़ लिए । उन पत्तों का दोना बनाने लगी । तभी भीमसेन आया । वह फलों के साथ लकड़ी का गट्ठर भी लाया था । जितने में रात भी गहरा चुकी थी । चकमक पत्थर से आग जलाकर सभी बैठ गए । हिंसक प्राणियों की चीखें आने लगीं । इससे दो लंबे रास्ते से गए होते, अच्छा रहता – सुशीला बोली ।

 वे ऑफ लाईफ प्रणेता, ध्यानसिद्धा

श्रमणी अक्षयश्री ‘आखा’ जी म.सा.

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