श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ – आनंदवाणी

जीवन की सांपसीढ़ी – एक दिलचस्प धारावाह (40 कोस का रास्ता)

(गतांक से आगे…)

इसप्रकार एक-दूसरे को धीर बँधाते हुए भीमसेन का परिवार मृणालघाट से दस कोस दूर निकल गया था । एक छोटीसी बस्ती आनेपर वे वहॉं रुके । लगभग 12 झोपड़ियों की वह बस्ती थी । 11 झोपड़ियों में लोग रहते थे, बारहवीं झोंपड़ी आने-जानेवाले राहगीरों के लिए रखी हुई थी । वही इन्हें भी रात्रि विश्राम के लिए मिल गई । किसी से दाल-चावल मिल गए, सुशीला ने सबके लिए पकाए और पेट भरा । बस्तीवालों ने इन्हें सोने के लिए चद्दर-तकिया आदि भी दे दिया ।

रात आराम करके सुबह होनेपर बस्ती से चलते समय भीमसेन ने हर झोंपड़ी को एक-एक रजतमुद्रा भेंट दी । बस्तीवाले धन्य-धन्य हो गए । बस्ती की सीमा तक छोड़ने आए तथा घोड़ों के लिए भी बस्तीवालों नेही गुड़-चना-घास खाने को दे दिया था । इसप्रकार दस दिन (50 कोस का सफर) व्यतीत हो गए । रास्त में छोटे गॉंव या बस्ती आने से बिना समस्या के रास्ता पार हो गया था । अब वह मुकाम आ गया था जहॉं से दो रास्ते फट रहे थे । भीमसेन ने आठ दिन में पार हो सकने वाला जंगल का छोटा रास्ता पसंद किया । और उस मार्ग पर वे, अश्वों सहित आगे बढ़ गए । 4 कोस दूर जाने के बाद एक छोटा-सा गॉंव आया ।

गॉंव दिखने में छोटा परन्तु सुन्दर था । सीमा पर ही नही थी । 200 घर थे । धर्मशाला ठहरने के लिए मिल गई । रसोई करनेके लिए ब्राह्मण भी मिल गया । 1 रजतमुद्रा में सारा काम हो गया । अश्वों को भी चारा-पानी दे दिया गया । मृणालघाट में भीमसेन ने 2 स्वर्णमुद्रा की 50 रजतमुद्राएँ कराईं । और इस गॉंव में 1 रजतमुद्रा की 100 त्रांबिकमुद्रा (तांबे की मोहरें) कराईं । रात्रि वहीं व्यतीत कर सुबह जल्दी नित्य-नियम से निवृत्त होकर वे सभी आगे बढ़े । भीमसेन ने धर्मशाला के रक्षक तथा नौकर को एक-एक रजतमुद्रा दी । अर्धकोश आगे जीने के बाद जंगल का रास्ता शुरू हुआ । रानी सुशीला व केतुसेन के अश्व पर 4 चद्दर तथा भीमसेन ने अपने अश्व पर शेष कपड़े, मुद्राओं की थैली तथा भोजन का डब्बा रख लिया । वनप्रदेश मनोहर था । धर्मशाला के रक्षक ने बताया थाकि रास्ते में कोई बस्ती नहीं आएगी । नदी किनारे 4 पर्णकुटीर (पत्तों की बनी हुई कुटिया) बनी हुई है जहॉं विश्राम किया जा सकता है ।

रास्ते में साथ में लाया हुआ भोजन परिवार ने किया । थोड़ी देर विश्राम कर आगे बढ़े । नदी किनारे पर्ण कुटीर आईं । किसी उत्साही पथिक ने ये कुटियाएँ बनाईं थीं । यहॉं पहुँचने तक वन अति गहन हो गया था । अश्वों से सभी नीचे उतरे पर सामान नहीं उतारा । पहले अंदर जाकर कुटिया देखी । मिट्टीकाफी थी। तथा एक घड़ा और लोटा वहॉं रखा हुआ था । दूसरी कुटिया में झाड भी रखी हुई थी । उन्होंने देखा कि रात बीताने के लिए जगह तो ठीक है, बस कुटिया जीर्ण हो चुकी है और उसका दरवाज़ा भी घास का ही है । अतः,रात को जंगली जानवरों से बजने के लिए आग जलाकर रखनी होगी । भीमसेन ने घड़ा उठाया और सुशीला को कहा कि तुम झाडू लगा दो, मैं तब तक पानी भरकर आता हूँ । फिर, सामान उतार दूँगा ।

सुशीला दोनों बच्चों को लेकर कुटिया में गई और झाडू लगाने लगी । इतने में कान फाड़ दे, ऐसी भयंकर चीत्कार से वातावरण थर्रा उठा । दोनों अश्व हिनहिनाने लगे । सुशीला भी डर के कारण, दोनों बच्चों का नज़दीक लेकर कुटिया के घास के दरवाजे को बंद करके खड़ी हो गई ।

 वे ऑफ लाईफ प्रणेता, ध्यानसिद्धा

श्रमणी अक्षयश्री ‘आखा’ जी म.सा.

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