श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ – आनंदवाणी

जीवन की सांपसीढ़ी – एक दिलचस्प धारावाह

(गतांक से आगे…)

‘‘और इसीलिए मैंने बाकी सारी स्वर्णमुद्राएँ पोटली में बॉंधी हुई थीं परन्तु कुछ स्वर्णमुद्राएँ मैंने मेरे उत्तरीय वस्त्र (कुर्त्ते) के एक कोने में बॉंध कर रखी हैं ।’’ उत्तरीय वस्त्र का कोना खोलकर भीमसेन ने मुद्राएँ सुशीला के हाथ में दीं । मिनीं तो पूरी 26 थीं । सुशीला ने चैन की गहरी सॉंस ली कि कुछ तो बचा । और पति की बुद्धिमानी की तारीफ करती हुई पति को देखके मुस्कुराती है ।

तत्पश्चात् सारा परिवार आगे बढ़ा । दक्षिण की ओर जानेवाली पगडंडी पर वे चले परन्तु शाम तक कोई गॉंव या बस्ती नहीं आई । न चाहते हुए रात घने जंगल में ही बिताई । लगभग तीन दिन – तीन रात ऐसे ही घोर जंगल में जहॉं इंसान नहीं, केवल जंगली – हिंसक प्राणी ही मिलते हैं, पेड़ों पर ही रात बिताई । इसप्रकार चलते-चलते 7 दिन पूरे हुए – केवल नदी या सरोवर का पानी और फल वाले पेड़ मिलें तो उनके फल-बस, इतना ही खाके भेट भरा । अचानक से आहार परिवर्तन और वो भी खुशी-खुशी नहीं, तप-त्याग के नाम पर नहीं । परिस्थिति वश खान पड़े तो मुश्किल आती है । और वो भी, भूख लगी कबसे, खाने को पाल मिलते कब । ऐसा कभी हुआ -कभी नहीं कि भूख लगते ही फल खाने को मिल गए । विचित्र उठा-पटक है कर्मों की ।

‘‘अजब तेरी कुदरत,अजब तेरी माया ।

किसी को हँसाया, किसी को रुलाया ॥

आठवें दिन एक गॉंव की सीमापर सभी पहुँचे । जंगल की झाड़ियों में से रास्ता पार करने के कारण सबके कपड़े कहीं-कहीं से फट गए थे । अतः, गॉंव में जाने में शर्म आ रही थी, परन्तु गॉंव में गए बिना नए वस्त्र भी नहीं आ सकते थे । गॉंव के बाहर तुरन्त ही धर्मशाला मिल गई । वहॉं का मुनीम 66 वर्ष का था और पिछले 36 वर्षों से धर्मशाला की देखरेख कर रहा था । मुनीम को भीमसेन ने अपना परिचय एक क्षत्रिय के रूप में दिया औ बताया कि महावन में लूटे जानेसे विपत्ति में आ गया है । वृद्ध मुनीम के हृदय में करुणा जागी और उसने भीमसेन को बिना किराया लिए ठहरने के लिए रुम भी दे दिया एवं भोजन की भी व्यवस्था करा दी । कुछ दिन यहीं धर्मशाला में ही आराम करने को कहा ।

भीमसेन खुशी-खुशी वहॉं रुका, भोजन किया एवं कुछ देकर विश्राम करनेके बाद मुनीम जी को उसने 5 स्वर्णमुद्राएँ देते हुए कहा कि इनके बदले में जितने चॉंद के सिक्के बनते हों, उतने मुझे दिलवा दीजिए । मुनीम ने मोहरें देखीं और कहा-‘‘येतो मगध-देश की लगती हैं । मूल्यवान हैं । हमारे यहॉं ऐसी 1-1 स्वर्ण मोहरों के बदले 50 रजतमुद्राएँ मिलती हैं। मुनीम ने विश्वसनीय सेवक को भेजकर एक सेठजी के पास से उनके बदले में 200 रजतमुद्राएँ मँगवा लीं । यह बुद्धिमानीथी भीमसेन की कि जहॉं किसी चीज़ को खरीदने में चॉंदी की मोहरों से काम चले, वहॉं सोने की क्यों काम में लेना? अतः, उसने सोने को चांदी में बदलवा लिया ।

फिर, वह गॉंव में जाकर दो-दो जोड़ी वस्त्र सबके लिए ले आया, तथा हलवाई से थोड़ी मिठाई ले आया और दो घोड़े भी खरीद लाया । आने के बाद सबने मिलकर मिठाई खाई और भीमसेन ने मुनीम को भी मिठाई दी ।

 वे ऑफ लाईफ प्रणेता, ध्यानसिद्धा

श्रमणी अक्षयश्री ‘आखा’ जी म.सा.

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