प्रेरक वचन दादी जानकी के – इस पुराने संसार के लिए मर जाना

मरने के बारे में उनको किसी प्रकार की कोई चिंता नहीं है। जब हम अपना जीवन भली-भॉंति जी चुके होते हैं, तो वे कहती हैं, हमारी मृत्यु सरल हो जाती है। मैंने उस एक परमेश्वर से जुड़ना और अपने मन को परे रखकर सुरक्षा का आनंद लेना सीख लिया। मेरे हृदय में और कोई नहीं है उसके सिवा, मैं पूर्णतः मुक्त हूँ। मेरे जाने के बाद और बहुत लोग हैं देखरेख करने के लिए। यदि हम समय का सदुपयोग करते हैं। ईश्वर से प्राप्त करके और दूसरों के साथ खुशी एवं सच्चाई बॉंटकर सम सुख-ही-सुख होगा।

समय घर लौटने का

मानवजाति अगर इस ग्रह तथा इस पर बसे लोगों की चिंता करने हेतु एक ’उपशामक दृष्टिकोण अपना ले, यह स्वीकार करते हुए कि इसकी दशा नाजुक फिर भी हमें समझना चाहिए कि उन बहुत थके हुए बच्चों के समान, जो भरी गरमी में शाम के समय घंटों खेलते रहे हैं और सुनना नहीं चाहते कि सोने का समय हो गया है, हम भी घर लौटने के लिए परमात्मा से आए बुलावे का प्रतिरोध महसूस करते हैं। हमें समझना चाहिए कि हमारी लंबी यात्रा ने हमें अज्ञान की किन गहराइयों में पहुँचा दिया है। हमें इस भौतिक जगत् के गर्द-गुबार, धूलमिट्टी से अपने लगाव को समाप्त करना है; लेकिन यह तभी हो सकता है, जब हमें ज्ञान हो कि अपने विश्राम के बाद हमें एक और लंबी तथा शानदार जीवनयात्रा के लिए लौटना होगा।

दादी जानकी का कहना है हालात बदलने जा रहे हैं। विश्व का कायाकल्प होगा। हमारा काम ईश्वर के प्रेम में डूबी, एक अशरीरी आत्मा होने की चेतनता में बने रहना है। मैंने ईश्वर को अपना मित्र बना लिया और अब वह मेरे जीवन में निरंतर मेरे साथ रहता है। इस भावना ने मुझे शुद्ध कर दिया है तथा मुझे अपने कर्मों में ईमानदार रहने की शक्ति दी है। मुझे इससे बहुत सुख मिला है।

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