प्रेरक वचन दादी जानकी के – इस पुराने संसार के लिए मर जाना

एलिजाबेथ कुबलर रॉस की कृति ने मरणासन्न की देखभाल में एक क्रांति लाने जैसा काम किया। इसने सेवागृह और उपशामक देखभाल संबंधी आंदोलनों को और आगे बढ़ाने में सहायता की तथा मृत्यु की धारणा को प्रतिष्ठा दिलाई। मृत्यु के पश्चात् जीवन की निरंतरता के बारे में उसके विचारों से चिकित्सा और विज्ञान के क्षेत्र में उसके अनेक सहयोगी सहमत नहीं थे, फिर भी लाखों-करोड़ों लोगों को मृत्यु और मृत्यु के निकट पहुँचने के अनुभव के बारे में बहुत कुछ अर्थपूर्ण जानकारी प्राप्त करने में सुविधा हुई।

उपशामक उपचार में मरीजों के भावनात्मक और शारीरिक दुःख-दर्द को कम करने और उस दु:ख-दर्द का निवारण करने पर ध्यान दिया जाता है। जहॉं तक मरने की प्रक्रिया को आसान बनाने का संबंध है, इससे न केवल रोगियों, बल्कि गंभीर या पुरानी बीमारी झेलनेवाले परिवारों के लिए भी जीवन की गुणवत्ता काफी सुधर जाती है। उपशामक उपचार में संलग्न डॉक्टरों का कहना है कि इससे पारंपरिक औषधीय उपचार की उपयोगिता भी उन्नत हो सकती है तथा जीवनकाल में वृद्धि हो सकती है।

संभवत: यही दादी जानकी के साथ हुआ है। उनका अधिकतर जीवन खराब सेहत के कारण कष्ट में बीता, लेकिन इस पुस्तक के लिखने तक, लगभग सौ के बाद भी उनकी सक्रियता में कोई कमी नहीं आई है।

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