प्रेरक वचन दादी जानकी के – इस पुराने संसार के लिए मर जाना

हम डॉक्टरों व अस्पतालों से आग्रह करते हैं कि कुछ भी करके वे मरणासन्न मरीज को बचा लें, कभी-कभी तो हम भारी रकम खर्च कर देते हैं, रोगी को कुछ दिन या कुछ सप्ताह जीवित रखने के लिए, जबकि हमें पता होता है कि बचने की कोई उम्मीद नहीं बची है। इंग्लैंड में आधी से अधिक मौतें अस्पताल में होती हैं, हालॉंकि रोगी कभी नहीं चाहता है कि अस्पताल पहुँचकर उसकी मृत्यु हो।

वास्तविकता का हमारा आंतरिक ’नक्शा’ हमें बताता है कि हम भौतिक जीव हैं और यह भी कि देह के साथ ही सबकुछ समाप्त हो जाता है, तो फिर क्यों हम मृत्यु को सबसे बड़ा दुःख मानकर चलते हैं और उसे टालना ही परम प्राथमिकता बना लेते हैं। जीवित लोगों के मन में हम अपनी जो स्मृतियॉं छोड़ जाते हैं, उसके अलावा हमारे जीवन का मूल्य क्या रह जाता है। जब हमें एहसास हो जाता है कि मृत्यु भ्रामक है, इस अर्थ में कि हमारा अस्तित्व कभी मिटता नहीं है, तो फिर मृत्यु का दंश निकल जाता है।

हमें जब यह ज्ञान हो जाता है कि इस शरीर को त्यागने पर हम खुद को अतीव आनंद की स्थिति में पा सकते हैं, मृत्यु तब और भी अधिक आकर्षक प्रतीत हो सकती है। हम जब जान जाते हैं कि हम संसार के रंगमंच पर शाश्वत रूप से अपनी-अपनी भूमिका निभाते हैं और यह भी कि हम जिस ढंग से अपनी देह छोड़ते हैं, वह आत्मा के भविष्य के लिए इसी समय एक प्रक्षेपण-पक्ष बना देता है, तब हमें ईश्‍वर द्वारा प्रदत्त सभी शक्तियों एवं सद्गुणों को लेकर आत्मचेतना में चले जाने का महत्त्व और मूल्य समझ आता है।

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