प्रेरक वचन दादी जानकी के – इस पुराने संसार के लिए मर जाना

उस घर-वापसी के लिए तैयार होने के लिए हमें अपने आपको ईश्वर के प्रेम में डुबो देना होगा और इस संसार से विरक्त होना होगा। इस समझ-बूझ और घर के बारे में जानकारी ने मेरे जीवन को सहारा दिया है। इससे मुझे बहुत लाभ हुआ है। जब तक हमें नाटक के बारे में जानकारी नहीं हो जाती, हम पूर्णतया आत्मचैतन्य नहीं हो सकते। हमें जब यह ज्ञान हो जाता है कि यह संसार बदलना है और यह भी कि प्रत्येक आत्मा के घर लौट जाने का समय आ पहुँचा है, इस ज्ञान से हमारे प्रयासों को स्मरण में बने रहने तथा दुर्गुणों की दासता से मुक्त होने की शक्ति प्राप्त होती है। फिर हम खुशी बॉंटनेवाले बन जाते हैं।

ईश्वर के साथ, अंतर्मुखी बने रहकर मैंने अपने अंदर एकाग्रता की शक्ति का विकास किया, जिसने मुझे इस पुरातन एवं दकियानूसी संसार में बड़ी शांति और सुख से रहने योग्य बनाया। मुझे हमेशा यही लगता रहा है कि ईश्वर ही मेरा संसार है और मुझे कुछ भी नहीं करना पड़ा है, सिवाय इसके कि मैं इस भावना के साथ जीती रही हूँ कि मेरा नाता केवल उस एक परमपिता से है, किसी अन्य से नहीं, और शेष सभी मेरे बंधु-बांधव हैं।

इस प्रकार की मानसिकता ने मुझे सभी सांसारिक प्रभाव या प्रलोभनों से दूर बने रहने का सामर्थ्य दिया है। मैं मन-ही-मन सोचती हूँ कि हालात न तो अच्छे हैं, न बुरे हैं और यह भी कि अपनी उस प्रकृति को पकड़े रहना आवश्यक है, जो आपको समस्याओं और घटनाओं में फिसलने न दें। संसार में रहते हुए मुझे इस बात का ज्ञान रहता है कि इसने शक्ति और सच्चाई खो दी है तथा अब यह समाप्त होने के कगार पर है।

मेरा कार्य नए संसार के लिए स्वयं को तैयार करना है। तरीका बस यही है कि पिता का स्मरण करो, मैं चाहे जो भी हूँ और जैसी भी रही हूँ, मैं उसकी हूँ। फिर मैं देह के परे होने की चेतना में स्थिर रह सकती हूँ और सृष्टिकर्ता की शांति एवं शक्ति मेरे चेहरे पर एवं मेरे कर्मों तथा संबंधों में आ जाती है, जो हर उस व्यक्ति को आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है, जिससे मैं भेंट करती हूँ। मेरे पास हर व्यक्ति के देने के लिए आध्यात्मिक प्रेम है। आप भी इस सूक्ष्म, ईश्वरीय प्रेम की गहराइयों में जा सकते हैं और आपके माध्यम से दूसरों को आध्यात्मिक प्रेम का अनुभव होगा।

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