प्रेरक वचन दादी जानकी के – अपनी पुरानी प्रकृति की तरफ से मन का जाना

बजाय इसके कि हम आसानी से अपनी भमिकाएँ निभा सकें, हम विभिन्न तरह से अपने आपको साबित करने की दौंड-धूप में पड जाते हैं-पुरुष और स्त्री के रुप में, माता-पिता के रुप में, परिवार का भरण-पोषण के रुप में, नागरिक के रुप में, धार्म के सदस्यों के रुप में, ‘भले लोग’ के रुप में या दबंगों के रुप में, नेताओं या अनुगमियों के रुप में, इस सूची का अंत नहीं।

इन या अन्य अनगिनत भूमिकाओं को निभाने में कुछ भी गलत नहीं है। भूल यह थी और है कि हम भूमिका और आत्मा में भेद नहीं कर पाते हैं, सोच बैठते हैं कि हम ही ये भूमिकाएँ हैं। उस भूल का परिणाम है कि समय के चलते, भूमिका बराबर कठोर-से-कठोर मॉंगें करने लगती है, क्योंकि हमारी यह चिंता अधिक बढ जाती है कि अगर हमने मॉंग पुरी नहीं की तो न जाने क्या हो जाए।

चिंता जितनी बढती जाती है, भूमिका उतनी ही अधिक बोझिल हो जाती है। बजाय इसके कि अपने वास्तविक अस्तित्व के गुणों-निश्‍चिंतता, प्रेम और सकारात्मकता, जो आत्मा में अंतर्निहित होती हैं, को हम भूमिका में ला सकें, भूमिका हम पर हावी हो जाती है|

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