प्रेरक वचन दादी जानकी के शांती की शक्ती

एवं बुद्धि ठीक काम करती है। वे सब संबद्ध हैं। बुद्धि जब अंतर्मुखी और केंद्रित रहती है, ध्यान लगाना आसान हो जाता है और मन कमजोर विचारों से मुक्त रहता है। बुद्धि के लिए यह जानना आवश्यक हो जाता है कि क्या याद रखना है और क्या भला देना है। यदि आप कडा-कर्कट अर्थात व्यर्थ विचारों को अंदर रहने देते हैं, वह किसी राजयोगी का जीवन नहीं है। यदि हम बहिर्मुखी दशा में चले जाते हैं, हम नीरवता का अनुभव नहीं कर सकते।

हमारे विचार हमारी मानसिकता का आधार हैं और हमारी मानसिकता के अनुसार होते हैं, हमारी दृष्टि पर भी यही बात लागू होती है। हम बहिर्मुखता, दैहिक-चेतना से जुड़े विचारों तथा व्यवहार का त्याग करके ईश्वर की दृष्टि में बने रहते हैं और फिर ईश्वर को हम अपनी आँखों से देख सकते हैं, वह हमें एक झलक से दूसरों को दूर ले जाने की क्षमता प्रदान करता है। नमन करने, अपनी पुरानी प्रकृति के प्रति मरणोन्मुखी होने, ईश्वर ज्ञान प्राप्त करने से और बाकी सबकुछ एक तरफ रखकर हम आँखों की रोशन बन जाते हैं। फिर हम खुश रहते हैं और हमारे साथ दूसरे लोग भी खुश रह हैं।

जब हम पहली बार चिंतन करना और इस ढंग से महसूस करना सीख रहे थे, दूसरों ने इसे हमारी कल्पना कहा वे हमारी प्रशंसा नहीं कर रहे थे। तथा कल्पना उस नकारात्मक अर्थ में कुछ अवास्तविक होती है और जो कुछ अवास्तविक है, वह अंतत: आपको ले डूबेगा। उसके विपरीत, हम इन विस एवं प्रथाओं के साथ 75 वर्ष से भी अधिक समय से अभ्यास करते आ रहे हैं और उनके कारण हम व्यक्ति के रूप में तथा एक संगठन के रूप में भी फल-फूल रहे हैं। मैं आपको यह विचार करने का न्योता देता हूँ कि हम सच्चाई के साथ काम कर सकते है।

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