शाश्‍वत यौगिक खेती (नये युग के लिए नया कदम) – शाश्‍वत यौगिक खेती – योजना की आवश्यकता

परिणामस्वरूप भीष्म जी को भी अन्तिम समय पर इसी तरह शरीर छोड़ना पड़ा । इस आख्यान को देखते हुए कर्मों की गुह्य गति यह समझाती है कि वर्तमान समय बहुत सारे लोग कहते हैं कि हमने अपने जीवन में इतना अच्छा कार्य किया, इतना-इतना कमाया, हमने आज तक कोई भी बुरा कर्म नहीं किया, किसी को भी दुःख नहीं दिया । लेकिन ऐसे व्यक्तियों के जीवन में भी ऐसी कुछ परिस्थिति आती है जो वो लोग भी दु:ख, अशान्ति, तनाव महसूस करने लगते हैं । तो इसका कारण भी यही है कि उन्होंने कोई ऐसे कर्म किये हैं, जिसका यह फल है ।

चाहे कोई भी बीमारी हो या समस्या हो, उसके लिये किसी दूसरे को दोषी ठहराने की बात ही नहीं उठती है । इसलिए वर्तमान समय जो भी कर्म हम कर रहे हैं उससे प्रकृति सहित सर्व को, जरा भी जाने अन्जाने में भी किसी को दु:ख न हो इस पर ध्यान देना बहुत आवश्यक है । कुदरती नियमों को थोड़ा भी डिस्टर्ब करना मनुष्य के अधिकार में नहीं है फिर भी अगर करेंगे तो हिसाब तो देना ही पड़ेगा ।

और भी गहराई में जाकर सोचने की बात है कि जब भीष्म पितामह जी जख्मी होकर शरशैया पर लेटे थे तो अर्जुन उनके पास शिक्षा लेने गये तो भीष्म जी ने बड़ी अच्छी शिक्षायें दी । उस समय अर्जुन ने पूछा कि जब द्रौपदी का वस्त्र-हरण हो रहा था, तब आप चुप क्यों रहे ? तब भीष्मपितामह जी ने कहा कि मैंने कौरवों का अन्न खाया था, वही खून मेरी नसों में दौड़ रहा था, अब आपके बाण लगने से वह खून निकल गया और अशुद्ध अन्न का प्रभाव खत्म हो गया है ।

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