शाश्‍वत यौगिक खेती (नये युग के लिए नया कदम) – जमीन को शक्तिशाली बनाने के लिए

फिर पहले वेस्ट मटेरियल जैसे धान का भूसा, गेहूँ का भूसा, गन्ने के पत्ते इत्यादि जो जल्दी सड़ते नहीं है, ऐसे पदार्थों का 15 से 20 सें.मी. मोटा थर बनाइये। इस पर पानी छिड़ककर गीला बनाएं। इसके ऊपर तैयार गोबर की खाद अथवा कम्पोस्ट खाद अथवा बगीचे की मिट्टी का 5 सें.मी. का थर लगाएँ। इससे केंचुएं सुरक्षित होते हैं। इसके ऊपर पूर्ण तैयार केंचुऐं छोड़ दें। प्रति 10 स्क्वेयर फीट में 2 हजार केंचुऐं छोड़ दें। इसके ऊपर बारदान से ढक देवें। 40 से 45% गीलापन रहे इसकी सम्भाल रखें। शेड में 20 से 30 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान रखें। केंचुऐं की रक्षा के लिए अन्दर कोई कीट वा चींटी न आये इस पर भी ध्यान रखना जरूरी है। एक दो दिन में आवश्यकता अनुसार पानी छिड़काएं। 30- 40 दिन में पूरी तरह से केंचुऐं की खाद तैयार हो जायेगी। केंचुएं अलग करके खाद को जमीन गीली हो तब जमीन में मिलाएँ।

फसलों का संरक्षण

प्रकृति में होनेवाले बदलावों को सहन करने की शक्ति और प्रहारों का सामना करने की शक्ति कुदरत ने सभी वनस्पति पेड़ों को दी हुई है। अगर जमीन शक्तिशाली है तो वनस्पति भी शक्तिशाली बनती है। उनकी रोग प्रतिकारक शक्ति बढ़ती है। कोई भी कीट या फफूंदी जैसी बीमारी आयेगी तो भी वह ठहरेगी नहीं। लेकिन जमीन शक्तिशाली नहीं होगी तो वनस्पति कमजोर बनती है और कीट तथा बीमारी को वनस्पतियॉं प्रतिकार नहीं कर पाती हैं इसलिए कीट प्रतिबंध दवाइयों का इस्तेमाल करना पड़ता है।

कुदरत का यह नियम है कि कोई भी कीट फसल पर आती है तो उसे नष्ट करने के लिए परभक्षी कीटक भी आते हैं। लेकिन उन परभक्षी कीटकों के लिए जो पर्यावरण चाहिए वह हमने ही नष्ट कर दिया है। अभी ऐसा पर्यावरण तैयार करना बहुत आवश्यक है। इसके लिए हमारा लक्ष्य यह रहे कि पहले जमीन को शक्तिशाली बनायें और पर्यावरण निर्माण के लिए खेती में पेड पौधे लगायें। इसके साथ ही हमें प्रकृति के नियम अनुसार जिस सीजन में जो फसल लेनी है उस सीजन में वही फसल लेनी है। वनस्पतियॉं भी योग्य वातावरण में ही अपना संरक्षण कर सकती हैं और कम खर्चे में ज्यादा उपज मिलती है।

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