प्रेरक वचन दादी जानकी के – अपनी पुरानी प्रकृति की तरफ से मन का जाना

जब हम एक नई काया प्राप्त कर लेते हैं और नई परिस्थितियों में नए संबंधों के साथ, एक ताजा दिमाग का इस्तेमाल करते हुए एक नए जीवन की शुरुआत करने हेतु आवश्यक साधन जुटाने में लग जाते हैं, हमारा व्यक्तित्व पिछले जन्म के व्यक्तित्व से अलग होता है। तो भी, हमारे पिछले जीवनानुभव से हमारे साथ चली आईं कुछ पूर्ववृत्तियॉं भी सामने आएँगी, जैसे-जैसे हमारी नई भूमिका उद्घाटित होगी। प्रत्येक आत्मा की एक अनूठी पहचान होती है, जो मन पर एक विशिष्ट चरित्र की छाप लगा देती है, हालॉंकि यह विकास के दौरे से गुजर रही होती है।

कर्म सिद्धांत की गलत व्याख्या

यह स्पष्टीकरण मानवजाति के लिए महत्त्वपूर्ण है। आत्मा की वास्तविक प्रकृति की अनदेखी करना भी उन अनेक कारणों में से एक कारण था, जो हमें अधोगति की ओर ले गए। लोग जब समझ नहीं पाते हैं कि उनके कर्म ही स्वयं आत्मा के लिए दीर्घकालीन परिणाम लेकर आते हैं, यह एक गलतसहमी है, जो उन्नत व्यवहार को निरुत्साहित करती है और इस बारे में सचेत होने से रोकती है कि जीवन में आत्मा किस गलत दिशा में जा रही है।

उदाहरण के लिए, भारत में अधिसंख्य लोग कर्म के इस सिद्धांत में विश्वास करते हैं कि जैसा बोओगे, वैसा काटोगे, लेकिन इसकी व्याख्या कभी-कभी इस ढंग से की जाती है कि उसके फलस्वरूप लोग आत्मोत्थान या आत्मसुधार के लिए प्रयत्न की अपेक्षा यथास्थिति को चुपचाप स्वीकार कर लेते हैं। यह कमजोरी इसलिए पैदा हुई है, क्योंकि हम समझ नहीं सके हैं कि आत्मा कर्म से उन्मुक्त नहीं है, बल्कि सकारात्मक और नकारात्मक कर्मों के परिणाम आत्मा स्वयं वहन करती है। चेतना धीरे-धीरे मर जाती है।

लोग सोचते हैं कि एक अधरे, दोषपूर्ण संसार में जीवन कभी-कभी हमसे स्वार्थी होकर काम करने की अपेक्षा अवश्य करता है। वे इस सोच में सुकून महसूस करते हैं कि किसी प्रकार का कोई दान करने से सब कुछ ठीक हो जाएगा। इस भ्रष्ट आचरण का प्रभाव आत्मा पर क्या होगा, उस ओर ध्यान नहीं दिया जाता है।

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