विश्वास और सच

प्रश्न 3: कहीं न कहीं पर हम जो मान्यता (बिलीफ सिस्टम) की बात करते हैं तो इतनी सारी मान्यताओं को लेकर, हमने प्रयोग किया है, लेकिन, क्योंकि अभी हम खुशी के स्तर (हैपीनेस इंडेक्स) को देख रहे हैं, यानि खुशी के स्तर की बात कर रहे हैं, तो अब देखना है कि दिनभर में मेरा जो खुशी का स्तर (इंडेक्स) है, वो स्थिर है या कहाँ-कहाँ ऊपर-नीचे होता है, आप देखिए कि पहले जो हमने कई चीजें देखी थीं, वो धारणाएँ ही थीं कि वास्तव में मेरी खुशी किस-किस पर निर्भर कर रही थी? आपने ध्यान दिया होगा कि जब मैंने यह कहा कि खुशी बाहर से आती है, तो मैंने देखा कि मेरी खुशी कहाँ-कहाँ निर्भर करती थी। मैंने अपनी मान्यता (बिलीफ सिस्टम) को बदल दिया। मुझे पता नहीं कि वो बदली हुई मान्यता अंदर तक गयी कि नहीं, लेकिन इस संकल्प से नई धारणा बन गई कि ’खुशी मेरी अपनी रचना है।’ तो इससे आपका क्या तात्पर्य है?

उत्तर : अभी तक हम सोचते थे कि साधनों से खुशी मिलेगी। अब खुशी मेरी अपनी रचना है। यहाँ पर दो मान्यताएँ (बिलीफ सिस्टम) हैं, हमारी निर्भरता उसके ऊपर नहीं है। मैं परेशान नहीं होऊँगा, अगर मेरे पास आज मोबाइल नहीं है, मैं परेशान नहीं होऊँगा कि मेरा मोबाइल दूसरे लोगों के हिसाब से अच्छा नहीं है। साधन उपयोग करने के लिए हैं, लेकिन अगर वो साधन ही मेरी परेशानी का कारण बनें, जो हम लाये तो थे यह सोचकर कि यह मुझे खुशी देंगे, लेकिन ये तो और ही परेशानी का कारण बन गए्। अब नयी मान्यता (बिलीफ) के साथ जीवन को जीने की कोशिश करें। साधन हैं उपयोग करने के लिए, साधन सुख देते हैं, खुशी पैदा नहीं करते। अब हम इसके तथ्यों को खोजेंगे और उस पर प्रयोग करेंगे। फिर अगर वो अच्छा लगेगा तो हम उसको कह सकते हैं कि यह सच है।’ हमारे व्यक्तित्व निर्माण में संस्कार महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।कुछ संस्कार हमें अपने माता-पिता से मिलते हैं, तथा अन्य अपने परिवार से, जो कि वंशानुगत संस्कार कहलाते हैं। कुछ संस्कार हम अपने पर्यावरण, अपनी राष्ट्रीयता, धर्म, संस्कृति एवं मित्रों से प्राप्त करते हैं। हमारे पूर्व-जन्म के आधार पर प्राप्त संस्कार भी बहुत महत्त्वपूर्ण होते हैं। हमारी आत्मा उन संस्कारों के साथ जन्म-दर-जन्म अपना आवरण बदलती रहती है। चौथे प्रकार के संस्कार हम अपनी इच्छा-शक्ति के आधार पर निर्मित करते हैं। प्रत्येक व्यक्ति की अपनी इच्छा शक्ति होती है। यह हमारी समझ पर निर्भर करता है कि हम उस इच्छा-शक्ति को महसूस करें तथा अपने अनुकूल उसका प्रयोग करें।

(प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय)

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