शाश्‍वत यौगिक खेती – भाग 2 (सफलता के आयाम) – जमीन को शक्तिशाली बनाने के लिए

किसान भाई-बहनों के अनुभव

शान्ति, प्रेम, आनन्द से भरपूर हो रहे हैं…। 4 से 4.30 बजे तक इसी प्रकार योग करने के बाद मैं अपनी खेती को इमर्ज कर योगदान देता हूँ 5 मिनट तक। उसके बाद फसल को भी 5 मिनट तक एकाग्र होकर योगदान देता हूँ। इस तरह से प्रतिदिन योग के प्रयोग से प्रकृति के तत्वों का बहुत अच्छा सहयोग मिलता है और फसल निरोगी, शक्तिशाली होकर बढ़ती है। जब भी मैं अपने खेत में पहुँचता हूँ तो पहले 5 मिनट योग करता हूँ, स्वयं को निमित्त समझकर परमात्मा की खेती में कर्म करने के लिए परमात्मासे प्रेरणा लेता हूँ, फिर कर्म करना आरम्भ करता हूँ।

इस विधि से कई बार खेती में कितनी भी समस्यायें आती हैं फिर भी कभी मन हताश उदास नहीं होता है। हर मुसीबत नया उमंग बढ़ाने में मदद करती है। किसी प्रकार का भय नहीं रहता है क्योंकि हम परमात्मा के आदेश अनुसार कर्म करते हैं तो जिम्मेवार भी वही है। खर्चे की तो बात ही नहीं क्योंकि मैंने एक देशी गाय को पाला है, उसका जो भी गोमूत्र, गोबर मिलता है उससे ही 3 एकड़ खेती के लिये खाद और दवाई बनाने में उपयोग करता हूँ। खेती के चारों ओर आवश्यक वृक्षारोपण किया है, उसी से दवाई बनती है।

खेती में ही एक कुटिया बनाई है, जब भी समय मिलें उसमें बैठकर योग करता हूँ। अब मुझे दुनियावी बातों में ज्यादा ध्यान देने की जरूरत नहीं है क्योंकि स्वयं भगवान मेरे मार्गदर्शक बने हैं। जो भी किसान आते हैं, पूछते हैं तो उनको समझाता हूँ कि कैसे खेती में आध्यात्मिकता का महत्व है। अपने विचार शुद्ध होते हैं तो खेती में भी कीट नहीं आते। मुझमें अगर कोई अवगुण नहीं तो मेरी फसल में भी कोई बीमारी नहीं आयेगी। जब अपने अन्दर बुराइयॉं वा कोई व्यसन हैं तो खेती में भी जरूर होंगी, इसलिए राजयोग के अभ्यास से जो भी आध्यात्मिक शक्तियॉं मिलती हैं वे सभी समस्याओं के लिये समाधान स्वरूप में एक दवाई का काम करती हैं।

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