‘मेरा’ सुख ‘किसके’ हाथ – हमारे अंदर की ऊर्जा

प्रश्न 4ः कहते हैं कि तनाव तो स्वाभाविक होता है, तो क्या हमें मानसिक तनाव को भी इसी तरह स्वीकार कर लेना चाहिए?

उत्तर : आपका प्रश्न ही गलत है। हम पहले भी चर्चा कर चुके हैं कि र मान्यता है कि तनाव स्वाभाविक है और इसी मान्यता के अनुकूल हम कार्य कर रहे हैं। मन की स्थिति के संबंध में भी लोग ऐसा ही सोचते हैं। जब हमें कष्ट होता है या तनाव होता है, तब हम अपने आप से यही कहते हैं। यह तो अपने आप ठीक हो जाएगा और फिर उस कष्ट को स्वीकार कर लेते हैं।

यदि कोई कहता भी है, तो हम यही जवाब देते हैं कि यह तो सभी को है, सिर्फ मुझे थोड़े ही है। अगर आप किसी कार्यशाला में चले जाएँ, जहॉं सौ या हजार लोग बैठे हो, वहॉं जाकर आप उन लोगों से एक साधारण-सा प्रश्न पूछे कि क्या आपको तनाव होता है? तो मैं विश्वास से कहता हूँ कि वहॉं आपको एक भी व्यक्ति ऐसा देखने को नहीं मिलेगा जो कि खड़े होकर कहे कि हॉं, मुझे तनाव नहीं होता है। 99 प्रतिशत लोग यही कहेंगे कि यह तो सभी को होता है। यह तो स्वाभाविक है, क्योंकि लोगों ने इसी के साथ जीना स्वीकार कर लिया है। इसके लिए हम अपने शरीर का ही उदाहरण लेते हैं। आये दिन हमें बताया जाता है कि प्रतिदिन सुबह जल्दी उठो, योगाभ्यास करो, व्यायाम करो के शरीर स्वस्थ रहे और हमारी प्रतिरोधक क्षमता का विकास हो।

(प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय)

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