समझ के लिए जरूरी है अंदर की प्रक्रिया को समझना

अपनी खुशी को स्थाई कैसे रखें?

खुशी की बात करते समय हमारे दिमाग में एक ही बात आती है कि हँसना, खिलखिलाना या आपस में चुहलबाजी करना ही खुशी है। इन सब बातों से ही लगता है कि वातावरण खुशनुमा है। लेकिन असलियत यह नहीं है। हँसना, खिलखिलाना, चुहलबाजी करना ये सब चीजें क्षणिक आनंद को तो प्रकट करती हैं, किंतु स्थायी खुशी नहीं कही जा सकतीं। खुशी हमारे अंदर को चीज है। हमारे अंदर की वह अनुभूति, जिसे हम खुद निर्मित करते हैं। अभी तक हमें यह बात समझ में नहीं आ रही थी। ऐसा लगता था कि हमारी खुशी इन्हीं सब बातों पर निर्भर है, जो बाहर-बाहर से घटित हो रही हैं। हमारी खुशी बहुत हद तक इन्हीं सब बातों पर निर्भर है। किंतु हमने देखा की इन सब चीजों में मेरी खुशी का जो स्तर है, वह हर रोज कभी ऊपर जाता है, तो कभी नीचे आता है। हम उन सभी बातों को देखें, जिन पर हमारी खुशी नर्भर करती है। हमने देखा कि परिस्थिति थी, लोग थे, लेकिन एक बात जो मन मे आई वह यह कि न तो वे लोग, न ही वह परिस्थिति और न ही वे बजे मुझे खुशी दे रही थीं, बल्कि खुशी तो मेरी अपनी ही रचना है।

(प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय)

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