‘विमलवाणी’

श्री आनंद गुरुवे नमः

आचारांग कहता है हे आत्मन तुने कितने जनम मरण कर लिए चौरासी का चक्कर तेरा मिटा नही। जितने अनंत भव किये कही पर मनुष्यभव की प्राप्ती हुई होगी तेरी बाल्यावस्था जवानी भी बिती बुढापा भी आया तेरी पुण्यवानी से मनुष्यभव जरूर मिला होगा। उगते सुरज को दुनिया नमन करती है। इनके चंद्रमाको भी नमन करता है। इज की चंद्रमाकी तरह तू बढता गया। प्रखर किरणे इस धरतीको तप्त करती है। दोनो अवस्थाये तुझे मिली होगी। वर्तमानमे भी मिली। आचारांग कहता है सब कुछ जो चल रहा है वह बितता जा रहा है। मनुष्यभव भी प्रवाहमान है और बिनता जा रहा है। आचारांग हमे जीने की कला सिखाता है। हमारी पुनवानी है कई तो मॉं के गर्भ मे आनेसे पहले ही चले जाते आना जाना कर्मोका खेल है – आचारांग कहता है तुझे यौवनावस्था जवानी तुझे मिली कुछ करनेके लिए। यौवनावस्था महत्वपूर्ण बात है। प्रमाद मत करो तिर्थंकरकी वाणी आगममे आचारांगमे बोलती है। छोटे छोटे सुत्रोमे गुढ रहस्यमय हुआ है आचारांगमे।

जवानीमे विषयविकारोकी ओर व्यक्ति भागता है। यौवनावस्थाको अगर संभाल लिया तो जिंदगी सुधर जाएगी क्युंकि भटक गया तो चौरासीके चक्कर मे भटकता रहेगा। क्युंकि जिंदगीमे बदलाव लाना जरुरी है। सायन्स कहता है, सुक्ष्म परिस्थितीमें संभालना है। पुराने बुजुर्गोका आहार पहले अच्छा था। पौष्टीक तत्व को अभी धरतीमाता के पास भी नही रहा। पहले हम कैसे कैसे थे अब ऐसे ऐसे हो गये। अतीत को याद करो। पहले कैसे थे हम अब कैसे हो गये। पहला जमाना कैसा था अब कैसा है। जीवनमे परिवर्तन नही तो धर्मपरिवर्तन आवश्यक है। क्युंकि आंतरिक परिवर्तन जरुरी है उपरी परिवर्तन नही। अपने चक्षु खोलो आसक्ती छोडो। (1) स्विकार करो स्विकार भाव आना चाहिए (2) समझौता (3) परिश्रम मेहनत पुरुषार्थ करो। आराम से बैठकर धर्मआराधना करो। ये 3 तत्व हमारे जीवनको सुखी कर सकते है। हमारी बीच की अवस्था भी अच्छी हो। विक्रमादित्य ने मुलरूपने प्रकट किया। पुरी अवंतीमे चर्चा फैलती है खोये हुए युवराज पुनः मिल गये। युवराज को भी बडी प्रसन्नता होती है सबके बिच रहकर। सब विक्रमादित्य के नारे लगाते है। विक्रमादित्य को मॉं की याद आती है। वह मातापिता की वंदन करके फिर वह आगे काम करेंगे। मॉं भी याद करती है। मॉं के पैर पडके उन्हे मॉं अपनेमे समा लेती है गले लगाती है। मॉं के आगे व्यक्ति सबकुछ खोल देता है।

(क्रमशः) – जैन श्रावक संघ, अहमदनगर

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