आंतरिक बल (भाग – 1)-प्रेम ही वासना है

जब तक हमें यह पता है कि बहनें क्या हैं और भाई क्या हैं अर्थात बहनें और भाईयों में क्या फर्क है, तो समझो यह भी अपवित्रता है। एक दीवार में और कबहन में कोई फर्क नजर न आये तब कहेंग सम्पूर्ण पवित्रता। ऐसी पवित्रता सिर्फ भगवान बीयाट से प्राप्त होती है परंतु आज मनुष्य के पास इतना समय नहीं है कि वह आठ घंटा बैठकर का अभ्यास करे। हर मनुष्य रोजी रोटी व दाल के चक्र में फंसा हुआ है। हम समझ से भी वासना को जीत सकते हैं। बहनों को बहनों से वासना पैदा नहीं होती क्योंकि जब वे एक-दूसरे से मिलती हैं तो उनके अंदर हर कोशिका में उपस्थित 23वां गुणसूत्र आकर्षित नहीं होता। ऐसे दी भाईयों को भाईयों से भी आकर्षण नहीं होता। जब कोई भाई किसी बहन से मिलता है तो उसे वासना उठने लगती है या कोई भाई मन में किसी महिला को याद करता है तो उसका उससे कर्जा सम्पर्क हो जाता है और उसमें वासना उठने लगती है। इस वासना से बचने का सबसे अच्छा उपाय यह है कि जैसे ही मन में कोई महिला याद आये तुरंत उसे मन से निकाल देकर उसकी जगह ब्रह्मा बाबा को देखने लग जाओ और परमात्मा को याद करो आप प्यार के साम हैं शांति के सागर हैं। वासना के विचार बंद हो जायेंगे। ब्रह्मा बाबा को जो नहीं मानते वह कृष्ण, श्री राम, श्री हनुमान, श्री गुरुनानक देव जी या जो भी कोई गुरु मानते हैं उसे देखने ला जाओ तो अपवित्रता तंग नहीं करेगी। अगर ये भी आपको मुश्किल लगता है तो किसी परुष को याद करो जिसे आप पसंद करते हैं। उसे तरंगे देते रहो आप शांत स्वरूप हैं।

इस तरह वासना तंग नहीं करेगी। अपवित्रता से बचाव नकारात्मक ध्रुव सकारात्मक ध्रुव को आकर्षित करता है। अगर ये ध्रुव साथ-साथ होंगे तो लगातार एक-दूसरे को खींचते रहेंगे जिससे इनकी चुम्बकीय शक्ति नष्ट हो जाती है। चुम्बक को एक-दूसरे के आकर्षण से बचाने के लिये हम दोनों चुम्बकों को दूर-दूर रख देते हैं। दूसरी विधि यह है कि दोनों के बीच लकड़ी रख दो। लकड़ी को चुम्बकीय शक्ति पार नहीं कर पाती। ऐसे ही बहनों में नकारात्मक चुम्बकीय बल पैदा होता है तथा भाईयों में सकारात्मक चुम्बकीय बल पैदा होता है। भाई और बहनें अगर दूर-दूर रखे जाये तो इनमें आकर्षण नहीं होगा। यह विधि कुछ हद तक सफल है। वास्तव में जैसे ही हम विपरीत लिंग को मन में याद करते हैं, हमारा उनसे ऊर्जा सम्पर्क हो जाता है और मन ही मन एक-दूसरे के प्रति अपवित्र विचार चलने लगते हैं। यहॉं दूरी कोई मायने नहीं रखती। सोचते ही अपवित्र चिंतन चलने लगता है। इस चिंतन को रोकने का सबसे उत्तम तरीका है कि जैसे ही विपरीत लिंग की याद आये, तुरंत उसे मन से निकालो। अगर आप बहन हैं तो किसी बहन को मन में देखने लग जाओ। अगर आप भाई है तो किसी भाई को मन में देखने लग जाओ और उन्हें सकाश दो आप शांत स्वरूप हैं। इस तरह अपवित्र विचार बदल जायेंगे। दूसरी विधि यह है कि अपने को आत्मा समझो दूसरे को भी आत्मा समझो और बाबा (भगवान) को याद करो तो इससे अपवित्र विचार रुक जायेंगे। जब स्थूल रुप से विपरीत लिंग आमने सामने हो तो उस समय बात करते समय अपने मन में अपनी ही जाति के लोगों को देखते रहे अर्थात् बहनें किसी बहन को देखती रहे और भाई किसी भाई को देखते रहें, इस तरह हमारे अपवित्र विचार रुक जायेंगे।

(क्रमश:361) (प्रजापिता ब्रम्हाकुमारी ईश्‍वरीय विश्‍व विद्यालय)

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