‘विमलवाणी’

श्री आनंद गुरुवे नमः

जीवात्मा अनादी कालसे चौरासी के चक्कर काटता है। कभी उच्च कुलमे जन्म लेता है तो कभी निम्न कुलमे। कभी तो उच्च कुलमे जन्म लेकर निचेका कार्य करता है तो कभी निम्न कुलमे जन्म लेके बहोत बडा कार्य कर लेता है। आगम मे वर्ण आता है गोत्रसे संबंधित हर एक की श्रेष्ठता और निम्नता दर्शाता है ‘‘से असई उच्चा गोये से असई निया गोये’’ आठ कर्ममे भी गोत्र का वर्णन आता है। ज्ञानी कहता है जीव आज तु श्रेष्ठ ऊंचे कुल को जाती को प्राप्त किया है उसका तू अभिमान मत करना। कर्म के कारण ही इन्सान को अहंकार घेर लेता है। ये अभिमान ये अहंकार ये इस जीवमें मिला है। गोत्र मे मिला है ये कर्म के कारण मिला है। इसकी वजहसे आत्माको ऊँची गती निम्न गोत्रमे जन्म लेना पडता है। कुछ न होनेके कारण भी व्यक्तिको अहंकार आ जाता है। कुछ न होनेके कारण भी व्यक्ति अहंकार करता है तो वह मद है।

अहंकार व्यक्ति बहोत करता है। थोडीसी संपत्ती कमाली तो घमंड आ जाता है लेकिन मद करता है तो गोत्र बांध लेता है। जीव का कोई भरोसा नही। भीतर के माल कभीभी ऊँचेनिचे हो सकते है। श्रद्धा मजबुत हो तो कोई हमे कुछ नही कर सकता। मरीची ने अपने भव मे अभिमान किया। अहंकार कर लिया। मेरी जातीसे बढकर कोई कुल नही। व्यक्ति अभिमान से पत्थर के दो तुकडे कर देता है। भ. ऋषभदेव का खांदान जैसे सोनेकी खाण है। कितने दिक्षाये उनके वहासे हुयी है। आचारांग कहता है मद अहंकार करता है जो उंची जाती गोत्र मिली है ज्ञान मिला है। अहंकार आनेवाले भव मे रहित बना देता है। आनेवाले भव प्राप्त नही होती है। भ. महावीर जब कुक्षीमे आते है तो साडेआठ महिने रहते है। हरिकेषी मुनीने निम्नजातीमे जन्म लेके संयम अंगीकार किया। ज्ञानी कहते है ऊंचे कुलमे जन्म लेके भी व्यक्ति निचा काम करता है। और निचे कुलमे जन्म लेके भी ऊंचा कार्य कर लेता है। गोत्र याने वाणी और आचरण से वह दर्शाता है। कोई व्यक्ति ऊंची जातीमे जन्म लेके भी शब्द वाणीका व्यवहार अच्छा नही करते। राजा आता है आभुषण पहनाये जाते है। चंद्रमा जैसे वो दिखते है। विक्रमादित्य अपने असली रुपमे होते है तो कहते है सभी इतने दिन तुम कहां थे। अवघूत का राज्याभिषेक होता है तो पूरा वेष बदल दिया। घटमात्र को समा के बीच छोडते है। सभी उनको पुछते है मेरा भविष्य क्या है। विक्रमादित्य अचानकसे प्रकट होते है। घटमात्र तुरंत उठते है अब ये रहस्य खोल दूँ। सभी विक्रमादित्य को देखते है राजसी वेष मे ओ होते है सभी कहते अवघूत कहा गये किसीके समझमे बात नही आती है। अवघूतही विक्रमादित्य है। अपने ही राजकुमार को देखकर सभी पुछते है सच कहो आप कौन हो? विक्रमादित्यने कहा जो अवघूत है वो विक्रमादित्य है और जो विक्रमादित्य है वही अवघूत है। सारी सभा प्रसन्न होती है घटमात्र सभा बात प्रजाके सामने कहते है।

(क्रमशः) – जैन श्रावक संघ, अहमदनगर

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