आंतरिक बल (भाग – 1)-प्रेम ही जीवन है

जिसको भी बच्चा देखता है उसकी मासूमियत सबको आकर्षित करती है तथा सब के दर्द दुख मिटा देती है। आँखों में कोई छल कपट नहीं होता। बच्चा जिस भी चीज को देखता है उसी के बारे जानने को उत्सुक रहता है। 8 से 11 वर्ष की उम्र तक पवित्रता बच्चे के कंठ में आ जाती है। बच्चे की आवाज बहत सुरीली होती है। जब लड़कों की आवाज बदल जाती है। पहले लड़के एवं लड़की की आवाज एक जैसी होती है। लड़कों की आवाज जब भारी हो जाती है तो समझो कि पवित्रता गले में पहुँच गई है। विपरीत लिंग का आकर्षण होने लगता है। 12 से 16 वर्ष की आयु तक पवित्रता मेरुदंड से होती हुई जननेइन्द्रिय में पहुँच जाती है। जब लड़कियों को मासिक आने लगता है। लड़को पर एक विशेष चमक एवं फुर्ती आ जाती है। 16 से 24 वर्ष की आयु तक पवित्रता मनुष्य के सारे शरीर में फैल जाती है। इस उम्र में पवित्रता बच्चों को आकर्षित करती है। 1 (एक) से 12 वर्षों तक पवित्रता को पीनियल ग्रंथी अपने नियंत्रण में रखती है। बच्चे को अपवित्रता परेशान नहीं करती। क्योंकि यह ग्रंथी उसको नियंत्रित कर लेती है। 12वें वर्ष में पवित्रता को पीचुटरी ग्रंथी नियंत्रित करती है। यह ग्रंथी जबरदस्ती पवित्रता को नियंत्रित नहीं करती। वह तो बस उससे सम्बन्धित स्त्राव पैदा करती है। बच्चे को अपने विवेक व समझ से अपवित्रता को नियंत्रित करना होता है। पृथ्वी के दो ध्रुव है, उत्तरी ध्रुव एवंदक्षिणी ध्रुव। ऐसे ही हर मनुष्य के दो शक्ति केन्द्र हैं, मस्तिष्क एवं जननेइन्द्रिय। मस्तिष्क को उत्तरी ध्रुव कहते हैं और जननेइन्द्रिय को दक्षिणी ध्रुव कहते हैं। पृथ्वी के दक्षिणी ध्रुव जोकि 50-60 किलोमीटर का इलाका है, कहते हैं वहॉं जो भी जाता है उसमें प्यार आ जाता है। हिंसक प्राणी भी वहॉं प्यार करने लगते हैं। वैर भाव भूल जाता है। ऐसा इसलिये होता है कि वहॉं से धरती में से प्यार की तरंगे निकलती है। ऐसे ही मनुष्य का दक्षिणी ध्रुव अर्थात् जननेइन्द्रिय से हर समय तरंगे निकलती रहती है जोकि प्रेम के आकर्षण की होती हैं। विपरीत लिंग से आकर्षण होने लगता है। आज लगभग सारा संसार ही इस प्यार के कारण ही अपवित्रता की ओर आकर्षित होकर भटक रहा है। ये ऊर्जा मेरुदंड के सबसे नीचे वाले मनके में नियंत्रित होती है। शरीर की सारी कोशिकायें आकर्षण सम्बन्धित शक्ति यहॉं पहुँचा देती है। इसलिये जो व्यक्ति जितना ज्यादा अपवित्रता के बारे सोचता है उतना ही ज्यादा इस मूल आधार चक्र के द्वारा कर्मइन्द्रिय में खिंचाव महसूस करता है। इसी चक्र में कुंडलनी शक्ति भी रहती है। जब मनुष्य कामुक चिंतन नहीं करता और ध्यान का अभ्यास करता है तो यह शक्ति ऊपर उठती है जो मस्तिष्क में पहुँच कर असम्भव कार्य करने लगती है।

अपवित्रता – अपवित्रता का कारण हर कोशिका में उपस्थित 23वां गुणसूत्र का जोड़ा है। यदि यह जोड़ा निष्क्रिय कर दिया जाये तो मनुष्य में अपवित्र विचार उठेंगे ही नहीं। इस जोड़े को निष्क्रिय करने के लिये ही हम योग लगाते हैं। जब हमारा मन भगवान से लगता है तो भगवान से ऐसी शक्ति प्राप्त होती है जिससे इस कोशिका के वासना के सूत्र काम करना बंद कर देते हैं। यह सूत्र तब आकर्षित नहीं होंगे यदि कम से कम अढ़ाई घंटे हर दिन का योग होगा। इन्हें जड़ से खत्म करने के लिये आठ घंटे का योग होना चाहिये। सम्पूर्णता क्या है? सम्पूर्णता अर्थात् हमें वासना का संकल्प तक न आये।

(क्रमश:360) (प्रजापिता ब्रम्हाकुमारी ईश्‍वरीय विश्‍व विद्यालय) 

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