व्यक्ति एक व्यक्तित्व अनेक – ब्रह्माकुमार भ्राता जगदीश चन्द्र एक जीवन्त जीवन-पथ

संस्था को नहीं जानते थे। अगर जानते भी थे तो ग़लत उड़ायी गयी बातों के रूप से, गाली भी देते थे। सहयोगी कम थे, विरोधी ज़्यादा थे। ऐसे समय पर जगदीश जी ने सब तरह की सेवा की। उन्होंने न केवल साहित्य की सेवा की, यज्ञ की हर तरह की सेवा की। _ आज तो हमारी एक से बढ़कर एक ऑटोमेटिक प्रिंटिंग मशीनें हैं. कम्पोजिंग के लिए कम्यूटर हैं। सब साधन हैं। उन दिनों हाथ से कम्पोज़ किया जाता था। एक-एक पेज सैट करके उस पर स्याही लगाकर एक-एक पेज का प्रूफ निकालते थे। उसको पढ़ेंगे, करेक्शन निकालेंगे, फिर कुछ मैटर जोड़ना या निकालना है तो दुबारा हाथ से उन अक्षरों को जोड़ना या निकालना पड़ता था। उन दिनों, प्रिंटिंग का काम बहुत कठिन था, मेहनत का काम था। कहने का मतलब यह है कि मेरे सामने ही लगभग आधी सदी तक भ्राता जगदीश जी ने बहुत मेहनत की, अथक होकर मेहनत की।

उनमें मैंने ख़ासकर के पॉंच विशेषतायें देखीं

कई मुझ से पूछते हैं कि जगदीश जी में क्या-क्या विशेषतायें थीं तो मैं यही कहँगा कि साकार बाबा में जो भी विशेषतायें और गुण थे, वो सब उनमें थे। सार में बताऊँ तो उनमें मैंने ख़ासकर के पॉंच विशेषतायें देखीं : (1) वे एक महान् ज्ञानी, (2) योगी, (3) त्यागी, (4) तपस्वी और (5) सेवाधारी थे। इसके अलावा वे महान् मितव्ययी थे। बहुत ज़्यादा खर्च करना उनको पसन्द नहीं था। वे एक बात हमेशा मुझे कहा करते थे कि हमारी हर वस्तु और कार्य बेस्ट (अति उत्तम), चीपेस्ट, (बहुत सस्ता) और अर्लिएस्ट (बहुत जल्दी) होना चाहिए- ये उनके तीन शब्द थे। वे कहते थे कि जल्दी और सस्ते में काम कराने का अर्थ यह नहीं है कि वो घटिया हो। बाबा हमेशा कहते थे कि बच्चे, यह काम जल्दी कराओ, समय बहुत कम है। जहॉं भी मेला होता था, प्रदर्शनी होती थी या शिवरात्रि दि कोई त्योहार आता था तो बाबा कहते थे कि पर्चे जल्दी छपवाके, दी उनको पहँचाओ। प्रिंटिंग का ऐसा काम है कि हर पहलू पर ध्यान से काम करो तब वह पूरा होगा। इसको भी वे जानते थे, फिर भी कहते थे कि जल्दी से जल्दी होना चाहिए ताकि उससे बहुतों की सेवा हो।

उनमें ज्ञान समझाने की कला बहत विशेष थी

दूसरों को ज्ञान समझाने की उनकी विधि विचित्र होती थी। उर्दू में ’सच्ची गीता’ लिखवानी थी। आज तो उर्दू की भी टाइप मशीन और फॉन्टस आ गये हैं। उन दिनों उर्द की टाइपिंग भी नहीं होती थी। उर्दू तो ज़्यादातर मुसलमान लोग ही लिखते थे और हाथ से ही लिखते थे।

(क्रमश:270) (प्रजापिता ब्रम्हाकुमारी ईश्‍वरीय विश्‍व विद्यालय)

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