आत्मिक शांति की खोज-‘ज्योति’ व ‘शब्द’ का अनुभव

जब कुछ बुद्धिमान लोगों ने ऐसी मशीने बनाई जो इंसान के लिए ’सोच’ सकती थीं, तो उसे दूर भविष्य की एक ऐसी कल्पना माना गया, जो शायद ही पूरी हो । पर आज हम देखते हैं कि हवाई जहाज़, अंतरिक्ष यान तथा कम्प्यूटर, आज की दुनिया की वास्तविकता बन गए हैं। अब इस बारे में किसी प्रकार के शक की गंजाइश नहीं है। जिसे पहले विज्ञान की कल्पना माना जाता था, अब वह विज्ञान की वास्तविकता है। आज के मानव ने यह ठीक प्रकार से समझ लिया है कि हर वस्तु को पाना संभव है, कोई भी चीज़ असंभव नहीं है।

जबकि विज्ञान इस खोज में लगा है कि इस जिंदगी के पश्चात् क्या होता है, वहीं विज्ञान के एक दूसरे क्षेत्र में यह जानने की कोशिश की जा रही है कि क्या अपनी मौजूदा जिंदगी में उच्चतर चेतनता के मंडलों में पहुँचा जा सकता है। आध्यात्मिक विज्ञान के द्वारा, लोग सक्रिय रूप से दूसरे मंडलों की खोज में लगे हैं। संत-महात्मा. सत्गुरुओं ने एक ऐसी विधि बताई है, जिसके द्वारा हम भौतिक सृष्टि की सीमा से ऊपर उठकर चेतनता के उच्चतर मंडलों की खोज कर सकते हैं। जब वे चेतनता के उच्च मंडलों की बात करते हैं, तो मस्तिष्क की विभिन्न अवस्थाआ (गहरी नींद, स्वप्न या जागृत अवस्थाएँ, जिनमें विभिन्न प्रकार की तरग मस्तिष्क में पैदा होती हैं) की बात नहीं करते, न ही वे उस विकृत चेतन अवस्था की बात करते हैं, जो नशीले पदार्थों से पैदा होती है, बल्कि व उन वास्तविक मंडलों की बात करते हैं, जिनमें हम आंतरिक ज्या

और ’श्रुति पर ध्यान टिकाकर एवं भौतिक शरीर से ऊपर उठ पहुँच सकते हैं। ध्यान-साधना (मेडिटेशन) के द्वारा हम उच्च मंडल खोज कर सकते हैं और स्वयं उनके अस्तित्व का प्रमाण पा सक उच्च मंडलों की णि पा सकते हैं। ध्यान-अभ्यास (मेडिटेशन) एक ऐसा रास्ता है, जिसके द्वारा हम अपनी तवज्जोह को दुनिया से हटाकर अंदर की तरफ करते हैं और दो आँखों के बीच में, शिव-नेत्र पर ध्यान केंद्रित करके आगे का रास्ता पाते हैं। यहॉं ध्यान टिकाने से, हम ’ज्योति’ और ’श्रुति’ की धारा से जुड़ जाते हैं और इस दुनिया से ऊपर आकर, आगे की दुनिया में प्रवेश करते ’ज्योति’ एवं ’श्रुति’ _ मैं यहॉं पर आप लोगों को बताना चाहूँगा कि ज्योति-श्रुति एवं अलौकिक मंडलों के बारे में अध्यात्म वेत्ताओं, संतों एवं महात्माओं ने क्या कहा है और फिर ध्यान-अभ्यास की विधि का वर्णन करूँगा, जिसके द्वारा वे उन मंडलों की यात्रा करते हैं।

(क्रमश:163) (कृपाल आश्रम, अहमदनगर)

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