अनमोल रत्न (भाग – 1)-ऋद्धियों-सिद्धियों की कीमत

एक कहानी है, जो हमें सुरत-शब्द योग तथा अन्य योगों के बीच के अंतर को समझाती है। एक बार एक संत एक नदी के किनारे शांत जीवन बिता रहे थे। एक योगी उनकी महानता के बारे में सुनकर उनके पास आया। वह वहॉं अपने अभिमान की वजह से आया, न कि नम्रता से। वह परम्परागत योगों में माहिर था और उसका विश्वास था कि वह महान संत, परमार्थ में उससे बेहतर नहीं हो सकता। संतों से कोई चीज छिपी नहीं होती। संत जी जानते थे कि योगी वहॉं क्यों आया है, परन्तु उन्होंने बड़ी विन्रमता और दीन भाव से उसका स्वागत किया। सुबह हुई और योगी तुरन्त वाद-विवाद में लगना चाहता था। परन्तु संत वर्षों से नदी के पार एक मन्दिर में पूजा करने जाते थे। मैं इतना शिक्षित नहीं हैं कि आपके साथ वाद-विवाद कर सकें संत ने कहा, मुझे विश्वास है कि आपसे मुझे बहुत कुछ सीखना है।

फिर भी क्या हमारा वाद-विवाद तब तक नहीं रुक सकता, जब तक कि मैं मन्दिर से अपनी हर रोज की प्रार्थना करके लौट न आऊँ?न चाहते हुए भी योगी इस बात पर सहमत हो गया। दोनों ही नदी के किनारे पहुँचे। ज्योंही संत नाव की ओर जाने लगे, तो योगी ने पूछा, क्या तुम नदी को पार करने के लिए नाव लेने जा रहे हो? जब संत ने हॉं में जवाब दिया, तो योगी ने विरोध प्रकट किया, मुझे तो बताया गया था कि आप एक महान आध्यात्मिक पुरुष हैं। फिर इसका क्या लाभ, अगर आप नाव के बिना इस नदी को पार नहीं कर सकते? योगी नदी पार करने के लिए अपनी यौगिक शक्तियों का सहारा लेना चाहता था और वह उनके लिये तैयार होने लगा।

उसी दौरान संत ने नाव पकड़ी और नदी पार कर गए। अपनी प्रार्थनाओं के बाद जब संत वापिस लौटे, तो उन्होंने योगी को कुछ अभ्यास करते हुए पाया, ताकि वह नदी पार कर सके। संत ने पूछा, क्या आप मन्दिर हो आए? योगी ने कहा, नहीं, मैं तो अभी पानी पर चलने के प्रारंभिक अभ्यास को ही पूरा कर पाया हूँ।संत इसी समय की प्रतीक्षा कर रहे थे । सतगुरु नम्रता की मूर्ति होते हैं, परन्तु जब वे सच्चाई को सीधे और स्पष्ट शब्दों में कहते हैं, तो उनका कोई सानी नहीं हो सकता। उन्होंने योगी से कहा, आपने तो बड़े जोर-शोर से अपने योग की महानता के बारे में बताया था, परन्तु मुझे तो यह आधी कौड़ी का भी नहीं लगा। योगी को गुस्सा आ गया और उसने कहा, आपने ऐसा क्यों कहा?

इस पर संत ने उत्तर दिया, आपने इन यौगिक शक्तियों को सीखने में कितने ही साल बेकार कर दिए। परन्तु इस मेहनत की कोई कीमत नहीं, क्योंकि मेरे नाव वाले ने इस काम को आधी कौड़ी के किराये में और इससे कम समय में कर दिया॥ यदि हमें एक पूरे महाद्वीप की यात्रा करनी हो, तो हम इसे पैदल चल कर भी पूरी कर सकते हैं। परन्तु अच्छा होगा, यदि रेल से यात्रा की जाए और इससे भी अच्छा होगा, यदि किसी हवाई जहाज से यात्रा की जाए। इसी प्रकार, हम अंतरीय अंतरिक्ष में यात्रा करने के लिये भिन्न-भिन्न तरीके प्रयोग में ला सकते हैं। परन्तु ध्वनि से भी तेज चलने वाले जेट तथा राकेट के इस युग में, अंतर में जाने के लिए सबसे आदर्श वाहन, नाम या शब्द का ही है। सुरत-शब्द योग का रास्ता अपनाकर हम नाम के हवाई जहाज में बैठ सकते हैं और यह हमें हमारे असली घर-हमारे परम लक्ष्य तक, सबसे जल्दी पहुँचाएगा।

(कृपाल आश्रम, अहमदनगर)

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