व्यक्ति एक व्यक्तित्व अनेक ब्रह्माकुमार भ्राता जगदीश चन्द्र एक जीवन्त जीवन-पथ

ज्ञान में आने के बाद सुचमुच भ्राता जी का जीवन ’ऋषि जीवन’ था। ’ऋषि’ शब्द संस्कृत भाषा से उद्भव हुआ है जिसका अर्थ है- ’द्रष्टा’ अर्थात् देखने वाला। ’द्रष्टा’ उसको कहा जाता है जो गहन तपस्या में तल्लीन रहता है और उस तपस्या में अनेक दिव्य दृश्यों को देखता रहता है। शास्त्रों में यह भी कहा गया है कि ऋषि, दिव्य पुरुष होते हैं जो मनुष्य, देवता और असुरों से भिन्न होते हैं। ये सदैव ध्यान, योग और अध्यात्मिक साधना तथा परीक्षण द्वारा दिव्य अनुभवों में खोये रहते हैं। ऋषियों में तीन वर्ग हैं- ब्रह्मर्षि, राजर्षि और देवर्षि। ब्रह्मर्षियों में तीन ऋषियों के नामों का उल्लेख आता है, वे हैं- वशिष्ठ, विश्वामित्र और याज्ञवलक्य। इन तीनों में ऋषि विश्वामित्र ही ज़्यादा प्रसिद्ध हैं। ब्रह्मर्षि वो हैं जो ब्रह्मा समान नयी सृष्टि की स्थापना करते हैं या नवयुग की स्थापना के कार्य में मन-वचन-कर्म से परमात्मा के सम्पूर्ण सहयोगी बनते हैं। ब्रह्मर्षि महान् तपस्वी और सिद्ध पुरुष होते हैं। राजर्षि की उपाधि केवल राजा जनक को प्राप्त हुई है। राजर्षि उनको कहा जाता है जो अधिकार, सम्पत्ति, मान और परिवार होते हुए भी उन सब से न्यारे, उपराम, अनासक्त और नष्टोमोहा होकर ईश्वर के मार्गदर्शन में चलते रहते हैं। देवर्षि की उपाधि केवल नारद जी को मिली है। देवर्षि वो हैं जो तीनों लोकों का भ्रमण करते हुए सबको ईश्वरीय सन्देश, आदेश और योग-शिक्षा देते रहते हैं। ये तीनों विशेषतायें अथवा ये तीनों ’ऋषित्व’ भ्राता जगदीश जी में थे, ऐसा कहना, मैं समझता हूँ, यह कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। 9 भ्राता जगदीश जी के लौकिक सहपाठी रहे हुए ब्रह्माकुमार भ्राता लक्ष्मण जी, जिन्होंने कुरुक्षेत्र में कई सालों तक ईश्वरीय सेवा की और सोनीपत की ज़मीन की देखभाल के निमित्त रहे, उनके बारे में इस प्रकार बताते हैं मेरा और जगदीश भाई का परिचय जून, 1946 में हुआ जब हम दोनों डी.ए.वी. कॉलेज में पढ़ रहे थे। वे ख़ास मुलतान शहर में रहनेवाले थे, मैं गाँव का रहनेवाला था। मेरे पास मेडिकल के विषय थे, उनके पास इन्टर आर्ट्स के विषय थे। वे बहुत चुस्त और फुर्तिले थे। उनकी ड्रेस बहुत ही साधारण- स़फेद कुर्ता और पायज़ामा थी। उन दिनों ही मैंने देखा कि उनकी रुचि ज़्यादातर योग में थी और परमात्मा की खोज में लगे रहते थे। समाजसेवा और देशभक्ति में उनकी बहुत रुचि थी। मुलतान में सूफी सन्त बहुत होते थे, वे उनके पास जाते थे और पूछते थे कि मैं ख़ुदा को कैसे याद करूँ ? वहाँ की थियोसोफिकल सोसाइटी में भी कभीकभी जाते थे। भगवान से कैसे योग लगायें, उसकी विधि की उनको बहुत खोज़ लगी रहती थी। उन्होंने शारीरिक योगासन भी सीखे थे। प्राणायाम करना भी वे जानते थे। (प्रजापिता ब्रम्हाकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय) (क्रमश : 3)

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